Samkaleen Vimarshvadi Upanyas समकालीन विमर्शवादी उपन्यास
Samkaleen Vimarshvadi Upanyas समकालीन विमर्शवादी उपन्यास
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Samkaleen Vimarshvadi Upanyas समकालीन विमर्शवादी उपन्यास

415.00

1 in stock

Author(s)Ramesh Chand Meena
रामेश चन्द मीणा

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 200 Pages | HARD BOUND | 2020 |
| 6 x 9 | 350 grams | ISBN : 978-93-89341-40-9 |

पुस्तक के बारे में

जब भोगवादी व्यवस्था युवा पीढ़ी का आदर्श बन गई हो, व्यक्ति का उद्देश्य येन-केन प्रकारेण स्वहित को साधना रह गया हो, व्यक्ति के पास कितनी मंहगी, गाड़ियाँ, मोबाईल, आलीशान बंगले ही स्टेट्स सिंबल बन गये हो ऐसे में समाज में संवेदनशीलता परहित-परोपकार, सामाजिक सरोकारों की बातें करना कल्पना जैसा प्रतीत हो चला है। आज के विकट दौर में भी कलम के सिपाही मैदान में डटे हैं जो किसी भी बाधा की परवाह किए बगैर अपनी लेखनी से समाज को दिशा दिखाने का काम कर रहे हैं। “साहित्य समाज का दर्पण है” यानी जो कुछ समाज में घटित हो रहा है वह तत्समय के साहित्य में दिखलाई देता है। एक लेखक, साहित्यकार की सफलता भी इसी में है जब पाठक उसकी रचना को पढ़कर उसे समाज के उस वर्ग तक पहुँचाएँ जिसको केन्द्र में रखकर वह लिखी गई है। कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि साहित्य का पाठक लेखक और समाज के मध्य सेतु का कार्य कर सकता है लेकिन यह सेतु बनना इतना आसान भी नहीं है। इस इंटरनेटी दौर में पाठकों की संख्या सिमटती जा रही है। लेखकों/साहित्यकारों के लिए यह चुनौती है कि उनकी रचना को पाठक नहीं मिल पा रहे हैं और फिर पाठक हैं ही कितने जो अपने पाठकीय धर्म का ईमानदारी से निर्वहन कर रहें है। पाठकीय धर्म से अभिप्राय है कि एक साहित्यकार की कृति का अध्ययन कर वह उसके उद्देश्य को समाज के सम्बन्धित वर्ग तक पहुँचाएँ जिसके सन्दर्भ में वह रचना रची गई है। एक सजग पाठकीय धर्म का निर्वहन करते हुए नजर आ रहे हैं डॉ. रमेश चन्द मीना, जो स्वंय एक शिक्षाविद् लेखक तो हैं ही अपितु समाज के विभिन्न वर्गों की ज्वलन्त चिन्ता को केन्द्र रखते हैं। दरअसल किसी भी वर्ग विशेष के विषय में अपनी अलग सोच रखना और उस पर चिन्तन करना एक चिन्तक के लिए आवश्यक हो जाता है। डॉ. मीना इस भूमिका में बखूबी नजर आते हैं। समाज का हरेक वर्ग चाहे वह बालक हो या स्त्री, दलित-आदिवासी, या फिर वृद्ध ही क्यों न हों प्रत्येक के बारे में चिन्तन करते हुए से लगते हैं।

– डॉ. सूरज सिंह नेगी, साहित्यकार एवं राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी, मो. 9460709680

पुस्तक में सभी विमर्शों पर आये प्रतिनिधि चुने हुए उपन्यासों का विश्लेषण मिलेगा। वृद्ध-विमर्श है या नहीं? जैसे सवालों का जवाब है यह पुस्तक। जबकि अब माना जा चुका है कि स्त्री-विमर्श व दलित-विमर्श अटकने व भटकने लगा है। ऐसे में आदिवासी-विमर्श हो रहा है तो चुपचाप एक और विमर्श जिसकी पदचाप सुनाई दे रही है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में इंपले की ‘वृद्धों की दुनिया’ आयी भले ही ठीक से नोटिस नहीं लिया गया वैसे ही जैसे स्त्री-विमर्श का पुरजोर विरोध लेखकों ने किया कि ऐसे कैसे हो सकता है कि स्त्री के बारे में स्त्री ही लिख सकती है? इसी तर्ज पर दलित जीवन पर दलित वृद्ध-जीवन पर वृद्ध ही लिख सकते हैं? यह सवाल उठाया जा सकता है। जवाब में लेखिकाओं ने आधा हिन्दी साहित्य का इतिहास के साथ कई रचनाओं के द्वारा अभियान चलाकर सिद्ध कर दिया कि सदियों से एकांगी लेखन हुआ है जिसमें स्त्री को चारदीवारी में कैद होकर रहना पड़ा है– दासी के रूप में। सती प्रथा, पर्दा-प्रथा, कन्यादान जैसे जंजाल व जाल में जकड़ कर रखा गया है। दलित सुर को शुरुआत में ही उठने से भरसक रोका गया है। उनके लिए शिक्षा के दरवाजे हमेशा से बन्द रखे गये हैं। आदिवासी को जंगल का जंगली जीव बतलाकर दलित जैसा ही व्यवहार किया जाता रहा है। ऐसे में वृद्ध को वृद्धाश्रम बनाकर घर से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। पिछली सदी से चला स्त्री-विमर्श अभी जारी है। मनीषा कुलश्रेष्ठ की तीन पुस्तकों के शीर्षक धर्म और स्त्री के आपसी सम्बन्ध पर होना मानीखेज है–1. धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत, 2. धर्म के आर-पार औरत, 3. धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत खंड-दो। धर्म दलित को समाज में व स्त्री को पुरुष से बराबरी का हक नहीं देता है। धर्म अन्ततः ब्राह्मणों का पोशक होकर दलित व स्त्री दोनों को हाशिये पर रखने का हथियार रहा है। भारतीय समाज में धर्म की भूमिका सकारात्मक कभी नहीं रही है। जबकि धर्म की स्थापना प्राणीमात्र के कल्याण के लिए की गयी है लेकिन नकारात्मक भूमिका के कारण समाज में भेदभाव, आडम्बर, पाखंड, धन प्रदर्शन, दलित व स्त्री-शोषण आदि रूप में देखा जा सकता है।

…इसी पुस्तक से…

अनुक्रम

भूमिका
प्राक्कथन

स्त्री-विमर्श

सहजीवन के देशी रंग
चित्रलेखा : स्त्रीवादी पाठ
बाजार में औरत

दलित-विमर्श

जातिवाद के गढ़ तोड़ने ही होंगे
दलित महिला के बहाने सियासत
गोदान के बरअक्स सूअरदान
चेतना का सफर
एक प्रखर समाज-वैज्ञानिक महानायक

आदिवासी-विमर्श

अभावों के बीच खिलता फूल
बाहरी दखल से मरते आदिवासी
भीलों का रॉबीनहुड ‘टंट्या मामा’
शहरी से परे आदिवासी
प्रतिरोध बनाम हिंसा : विशेष सन्दर्भ 1084वें की माँ
विकास की आँधी में उड़ने वाले
मगरी मान के गुरु

वृद्ध-विमर्श

दस्तक देता वृद्ध विमर्श
बाजार में आदमी के लिए जगह
अपेक्षा बनाम उपेक्षा
पारिवारिक सम्बन्ध बूमरेंग की तरह होते हैं
सुबह का भूला शाम को लौटा

धर्म-विमर्श

अहर्निश युद्धरत राम
आध्यात्म के शो रूम

बाल-विमर्श

बच्चे की नजर में दुनिया
बचपन पर सवार माँ

1 in stock

Description

रमेश चन्द मीणा

रमेश चन्द मीणा (सह-आचार्य हिन्दी) l शिक्षा : एम.ए. हिन्दी, एम फिल, पीएच डी (जे.एन.यू.) l नौ पुस्तकें प्रकाशित–‘आदिवासी लोक और संस्कृति’, ‘दलित साहित्य एक पड़ताल’, ‘आदिवासी विमर्श’, ‘आदिवासी दस्तक’, ‘चित्रलेखा : एक मूल्यांकन’, ‘उपन्यासों में आदिवासी भारत’, ‘वृद्धों की दुनिया’, ‘आदिवासियत और स्त्री चेतना की कहानियां’, (कहानी संग्रह) ‘विकास से परे अंधेरे से घिरे (संस्मरण)’, ‘साक्षात्कारों में आदिवासी’ (सम्पादन ) l ग्यारह सम्पादित पुस्तकों में शोधालेख– ‘माओवाद, हिंसा और आदिवासी, आज के प्रश्न’, ‘लोकरंग’, ‘वरिमा’, ‘आर्यकल्प’, ‘मधुमती’, ‘न्याय की अवधारणा में दलित’, ‘दलित लेखन में स्त्री चेतना’, ‘आदिवासी साहित्य’, ‘आदिवासी उपन्यास साहित्य’ l सम्प्रति– राजकीय पीजी महाविद्यालय, कोटा विश्वविद्यालय, कोटा राजस्थान, बून्दी राजस्थान– 323001 l पता : 2-ए-16, मोती-कुंज, जवाहर नगर, माटुंदा रोड़, बूंदी, राजस्थान–323001 l email-cmramesh1965@gmail.com l फोन– 9460047347

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