Samaveshi  Rashtra ki Sankalpana : Premchand avam Sudarshan ki Rachnao me Drashtibadhit jan <br> समावेशी राष्ट्र की संकल्पना : प्रेमचंद एवं सुदर्शन की रचनाओं में दृष्टिबाधित जन
Samaveshi Rashtra ki Sankalpana : Premchand avam Sudarshan ki Rachnao me Drashtibadhit jan
समावेशी राष्ट्र की संकल्पना : प्रेमचंद एवं सुदर्शन की रचनाओं में दृष्टिबाधित जन
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Samaveshi Rashtra ki Sankalpana : Premchand avam Sudarshan ki Rachnao me Drashtibadhit jan
समावेशी राष्ट्र की संकल्पना : प्रेमचंद एवं सुदर्शन की रचनाओं में दृष्टिबाधित जन

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समावेशी राष्ट्र की संकल्पना : प्रेमचंद एवं सुदर्शन की रचनाओं में दृष्टिबाधित जन

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समावेशी राष्ट्र की संकल्पना : प्रेमचंद एवं सुदर्शन की रचनाओं में दृष्टिबाधित जन

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Author(s) — Mahinder Singh Dhakad
लेखक –  महेन्द्र सिंह धाकड़

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 134 Pages | HARD BOUND | 2021 |
| 6 x 9 Inches | 450 grams | ISBN : 978-93-91034-12-2 |

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Description

महेन्द्र सिंह धाकड़

महेंद्र सिंह धाकड़ प्राध्यापक के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी महाविद्यालय में विगत 12 वर्षों से इतिहास विभाग में अध्ययन एवं अध्यापन में कार्यरत हैं। इनकी शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से हुई। इन्होंने इतिहास विषय में स्नातक, स्नातकोत्तर, एम. फ़िल की उपाधि अर्जित की।
मूलरूप से इन्होंने हिदू धर्म जाति और जाति-सम्मत विचारों का अध्ययन किया है। मुख्य रूप से विद्यावाचस्पति (Ph.D.) शोधकार्य अम्बेडकर के नागरिक अधिकारों के लिये संघर्ष मंदिर-प्रवेश आन्दोलन तथा सार्वजनिक स्थानों के उपयोग और समान अधिकारों की मांग से संम्बधित है। अम्बेडकर के हिन्दू धर्म के साथ अनुभव और बोद्ध धर्म की नवीन व्याख्या पर भी इन्होंने गहन एवं तर्कसम्मत विचार प्रस्तुत किया है। इनका पीएच.डी. का कार्य जारी है।

पुस्तक के बारे में

यह पुस्तक समावेशी राष्ट्र की संकल्पना पर आधारित है। लेखक ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि शुरुआती दौर में भारतीय राष्ट्र की अवधारणा संकुचित रूप में विकसित हुई जिसके अन्तर्गत जातीय-व्यवस्था एवं वर्ण-व्यवस्था को श्रेष्ठ बताया जाने लगा और जाति को विश्वव्यापी व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर लिया गया। 18वीं सदी में साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतीयों को एकजुट होकर अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का विचार मुखर होने लगा तो दूसरी ओर कट्टर राष्ट्रवाद की अवधारणा भी सामने आई। प्रताप नारायण मिश्र ने हिन्दी, हिन्दू, और हिन्दुस्तान का नारा दिया। इसी दिशा में मुंशी प्रेमचन्द की दो रचनाओं— ‘सोज़-ए-वतन’ एवं ‘जलवा-ए-असर’ को देखा जा सकता है। लेकिन धीरे-धीरे मुंशी प्रेमचन्द में बदलाव दिखाई देता है, पहले जहां वे राजपुरूषों की वीरता एवं श्रेष्ठता पर भरोसा करके भारत की स्वतन्त्रता का सपना देखते थे, वहीं अब गाँधी जी के प्रभाव में आकर सत्य, अहिंसा के माध्यम से देश की आजादी का मार्ग तलाशने लगे। इस पुस्तक में मुख्य रूप से प्रेमचन्द की दो रचनाओं—‘रंगभूमि’ (उपन्यास) एवं ‘पत्नी से पति’ (कहानी) को लिया गया है, जिनके मुख्य नायक दृष्टिबाधित जन हैं। इसी दिशा में पं. सुदर्शन की तीन रचनाओं को रखा जा सकता है। ये हैं — ‘भाग्यचक्र’ (नाटक), जिसका प्रमुख नायक सूरदास है तथा दो कहानियाँ ‘सूरदास एवं रजनी’ के भी नायक दृष्टिबाधित जन हैं। भाग्यचक्र नाटक का नायक स्वयं तो एक संगीतकार है जो भिक्षाटन द्वारा अपना जीवन-यापन करता है लेकिन दूसरी ओर वह आमजन को राष्ट्र सेवा एवं स्वतन्त्रता के लिये बलिदान करने के लिये प्रेरित करता है। इसी तरह की रचनाओं में अनन्त गोपाल शेवडे़ की तीन रचनाओं—‘निशा गीत’, ‘ज्वालामुखी’ एवं ‘मंगला’ जैसे उपन्यासों को रखा जा सकता है। जिनके नायक दृष्टिबाधित जन हैं।

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