RAMNARAYAN SHUKLA : Shabd aur Karm ke Partibadh Sadhak <br>  रामनारायण शुक्ल : शब्द और कर्म के प्रतिबद्ध साधक
RAMNARAYAN SHUKLA : Shabd aur Karm ke Partibadh Sadhak
रामनारायण शुक्ल : शब्द और कर्म के प्रतिबद्ध साधक
₹175.00 - ₹250.00

RAMNARAYAN SHUKLA : Shabd aur Karm ke Partibadh Sadhak
रामनारायण शुक्ल : शब्द और कर्म के प्रतिबद्ध साधक

RAMNARAYAN SHUKLA : Shabd aur Karm ke Partibadh Sadhak
रामनारायण शुक्ल : शब्द और कर्म के प्रतिबद्ध साधक

175.00250.00

Author(s) — Shashank Shukla
लेखक — शशांक शुक्ला

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 124 Pages | 2021 |
| 5.5 x 8.5 inches |

| available in HARD BOUND & PAPER BACK |

Description

शशांक शुक्ल

डॉ. शशांक शुक्ला : जन्म : 22 सितंबर 1979 में बेलाहीं, सोनभद्र में। उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग से। अध्यापन अनुभव : लगभग 16 वर्षों का अध्यापन अनुभव। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ; वसन्त महिला महाविद्यालय; केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, हैदराबाद केन्द्र; हैदराबाद केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय में अध्यापन के पश्‍चात उत्तराखंड मुक्त विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एवं विषय समन्वयक के रूप में लगभग 9 वर्ष कार्य। तत्पश्‍चात दिसंबर, 2019 से जम्मू केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय के हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत। सम्पादन : शोध पत्रिका परमिता का लगभग 10 वर्ष तक सम्पादन, उत्तराखंड मुक्त विश्‍वविद्यालय के न्यूज़ लेटर उड़ान का सम्पादन, जम्मू केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय की पत्रिका उत्तर वाहिनी के उप सम्पादक। साहित्य सिद्धान्त : साम्वेदनिक साहचार्यता का सिद्धान्त, रचना-अन्तराल का सिद्धान्त, साहित्यिक विकास का सिद्धान्त नामक नए साहित्य सिद्धान्त का निर्माण कार्य। स्थायी भाव और संचारी भाव पर नए ढंग से कार्य विस्तार। पुस्तकें : एक आलोचक की डायरी (डायरी-आलोचना) – शीघ्र प्रकाश्य; गिरोह का ब्रह्मभोज तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह) – शीघ्र प्रकाश्य; उत्तराखंड मुक्त विश्‍वविद्यालय के लिए 16 पाठ्‍य पुस्तकों का सम्पादन। सम्प्रति : जम्मू केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय के हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत। सम्पर्क : parmita.shukla@gmail. com मो. : 9917157035

पुस्तक के बारे में

शशांक शुक्ल ने प्रो. रामनारायण शुक्ल के जीवन को ‘शब्द और कर्म के प्रतिबद्ध साधक’ के तौर पर देखा है। अपने दौर के स्थापित विचारों और विद्वानों से असहमति प्रकट करने का साहस उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का साक्ष्य देते हैं। इस दृढ़ प्रतिबद्धता का प्रतिफल है, अपने विचारों को बौद्धिक कलाबाजी तक सीमित रखने से जिद भरा इंकार करने वाला उनका कार्यकर्त्ता रूप और राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा। अपनी पारिवारिक परिस्थितियों से जूझते हुए तरक्की पसंद ख्यालों के ख्वाब नई पीढ़ी की आँखों तक पहुँचाने वाले इस व्यक्ति पर केंद्रित पुस्तक में बीएचयू के सांस्कृतिक-राजनीतिक आरोह-अवरोह भी दर्ज हैं। लिहाजा इस जीवनी को न सिर्फ रामनारायण शुक्ल, बल्कि देश के एक विशिष्ट हिंदी विभाग के जरिए हिंदी-समाज की मानसिक बुनावट को समझने के लिए पढ़ा जाना चाहिए।

— डॉ राजीव रंजन गिरि, युवा आलोचक

जन संस्कृति मंच से पहले मेरा सक्रिय जुडाव रामनारायण शुक्ल और राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा से रहा। मैं मोर्चे के बनने से बिखरने तक का साक्षी रहा हूँ। डॉ. शशांक शुक्ल ने आदरणीय शुक्लजी की स्मृतियों को संजो कर एक बड़ा काम किया। निश्चय ही इन संस्मरणों पर उनके श्रद्धानुरंजित उच्छ्वासों का रंग गहरा है और यह स्वाभाविक भी है। इस स्मृति आलेख को एक अत्यंत आत्मीय स्वजन के मनोगत साक्ष्य के रूप में पढना चाहिए। वस्तुतः यह शुक्ल जी की जीवनी नहीं, वरन् उनके अंतरंग स्नेह भाजन का स्मृति आलेख ही है और इसीलिए उसके सबसे मार्मिक अंश वे हैं जो घरेलू प्रसंगों को जीवंत करते हैं।

— प्रो. अवधेश प्रधान, प्रसिद्ध आलोचक

वसन्त महिला महाविद्यालय में साक्षात्कार की तिथि तय हो गयी थी। हिन्दी साहित्य के एक आलोचक के नेतृत्व में एक मीटिंग हुई। तय किया गया कि शुक्ल जी के भतीजे का अपॉइंटमेंट नहीं होने देंगे। निश्‍चित तिथि को साक्षात्कार की प्रक्रिया सम्पन्‍न हुई। एक्सपर्ट के रूप में दिल्ली की एक प्रतिष्ठित आलोचिका का आगमन। साक्षात्कार का परिणाम प्रतिकूल रहा, यह तो सामान्य तथ्य हुआ; किन्तु जब यह मालूम चला कि आलोचिका ने उद्‍घोष किया था कि–“शुक्ला जी के घर के लड़के का चयन नहीं होने दूँगी…।”

विभाग के एक अत्यन्त सुहृद आचार्य ने रहस्योद्‍घाटन किया– “शुक्ल जी ने एक बार मंच से आलोचिका का विरोध किया था…लगता है वही बात उनके मन में अभी तक चुभी हुई है…।”

“…मैंने तो विचार बोये थे… चाहता था कि गलत का प्रतिरोध करने की चेतना निर्मित कर दूँ…; लेकिन लगता है ये तथाकथित बड़े लोग सच नहीं सुनना चाहते…बस अपने ‘अनुकूल बात’ सुनना चाहते थे…।”

…इसी पुस्तक से

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