Prem ke Paath <br> प्रेम के पाठ (कहानी संग्रह)
Prem ke Paath
प्रेम के पाठ (कहानी संग्रह)
₹200.00

Prem ke Paath
प्रेम के पाठ (कहानी संग्रह)

200.00

10 in stock

Author(s)Ramesh Upadhyay
रमेश उपाध्याय

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 115 Pages | PAPER BOUND | 2020 |
| 5.5 x 8.5 inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-31-7 |

पुस्तक के बारे में

‘‘आप प्रेम की कविता लिखना चाहते हैं, तो प्रेम कीजिए। करते हैं? अभी नहीं? कोई बात नहीं, हम उस प्रेम की बात कर भी नहीं रहे। हम उस प्रेम की बात कर रहे हैं, जो खुद से किया जाता है; जो हमें अपनी खुदी से मिलाता है और बेखुदी तक ले जाता है। खुदी के बारे में इकबाल का शेर आपने सुना होगा–‘खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।’ खुदी को बुलंद करने का मतलब है खुद को इतना बड़ा बना लेना कि आप सारी दुनिया से, सारी कायनात से प्यार कर सकें। मगर इसका मतलब खुदा बन जाना या खुद को खुदा समझने लगना नहीं है। खुदा कौन है, क्या है, आप यह जानने के चक्कर में न पड़ें। उसे न कोई जान सका है, न जान ही सकता है। जिस चीज को आप जानते नहीं और जान भी नहीं सकते, वह चीज आप कैसे बन सकते हैं? बन नहीं सकते और फिर भी समझते हैं कि आप वह हैं, तो समझिए कि आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं। खुदी को बुलंद करने का मतलब अहंकार नहीं है, खुद को औरों से या सबसे बड़ा समझने लगना नहीं है; बल्कि खुद को ऐसी ऊँचाई तक ले जाना है, जहाँ से आप सारी कायनात को देख सकें, उसे बाँहों में लेकर उससे प्यार कर सकें। जो वहाँ पहुँच जाता है, वह खुद को भूल जाता है। यही बेखुदी है। और दुनिया भर की अच्छी प्रेम कविता इसी बेखुदी के आलम में लिखी गयी है।’’

इसी संग्रह से

आजकल लिखी जा रही प्रेम कहानियों में वह प्रेम कहाँ है, जो हम अपने परिवार के लोगों से, सगे-संबंधियों से, पड़ोसियों से, मित्रों से, सहकर्मियों से, देशवासियों से और मनुष्य होने के नाते दुनिया भर के मनुष्यों से करते हैं? उनमें वह प्रेम भी कहाँ है, जो हम मानवेतर प्राणियों से, प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित सुंदर वस्तुओं से, साहित्यिक और कलात्मक कृतियों से, मानव-जीवन को बेहतर बनाने के लिए किये जाने वाले कार्यों से तथा उन कार्यों को करने वाले लोगों से करते हैं? उनमें तो वह प्रेम भी नजर नहीं आता, जो हम स्वयं से, अपने जीवन से और एक मानवीय जीवन जीने के लिए किये जाने वाले अपने कार्यों से करते हैं, जिनमें प्रेम करने, विवाह करने, परिवार चलाने, बच्चे पैदा करने और उन्हें अच्छी तरह पाल-पोस तथा पढ़ा-लिखाकर अच्छा इंसान बनाने जैसे बहुत-से कार्य शामिल हैं। आजकल की बहुत-सी प्रेम कहानियों में प्रेम को केवल ‘‘दो व्यक्तियों का निजी मामला’’ और वह भी केवल यौन संबंधों तक सीमित मामला बना दिया जाता है, मानो उन व्यक्तियों का अपने जीवन के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक यथार्थ से कोई लेना-देना न हो और वे ऐतिहासिक रूप से विकसित मानवीय व्यक्तित्व न होकर केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन में लिप्त पशु हों! प्रेम कहानी केवल प्रेम की कहानी नहीं होती। वह संपूर्ण जीवन और जगत की कहानी होती है। वह जीवन और जगत को प्रेममय बनाकर बेहतर और सुंदर बनाने के उद्देश्य से लिखी जाने वाली कहानी होती है। अतः समाज की वर्तमान व्यवस्था की आलोचना तथा उसकी जगह किसी बेहतर समाज व्यवस्था की माँग प्रेम कहानी अनिवार्यतः करती है। जो कहानी ऐसा नहीं करती, वह वर्तमान व्यवस्था या यथास्थिति को बनाये रखने का काम करती है और वह वास्तव में प्रेम कहानी न होकर शासक वर्ग के मूल्यों का प्रचार करने वाली कहानी होती है। विश्व साहित्य की महान प्रेम कहानियाँ अथवा सभी देशों में सदियों से लोक में प्रचलित प्रेम कहानियाँ अपने समय की समाज व्यवस्था से टकराने वाली कहानियाँ हैं। उनमें से ज्यादातर प्रेम पर लगे सामाजिक प्रतिबंधों की कहानियाँ हैं, जिनके नायक-नायिका भले ही उन प्रतिबंधों को न तोड़ पायें, भले ही उनका अंत निराशा या मृत्यु में होता हो, लेकिन उनकी कहानी अपने समय की समाज व्यवस्था की आलोचना तथा उसके बदले जाने की माँग करने वाली कहानी होती है।

– रमेश उपाध्याय

अनुक्रम

  • भूमिका– प्रेम कहानी केवल प्रेम की कहानी नहीं होती
  • पहुँचे तो पार
  • एक सीढ़ी ऊपर
  • कामकाज
  • कहीं जमीन नहीं
  • दूसरा दरवाजा
  • आप जानते हैं
  • मेरा नाम क्या है?
  • एक झरने की मौत
  • अविज्ञापित
  • जड़ें
  • प्रेम के पाठ
  • काठ में कोंपल

10 in stock

Description

रमेश उपाध्याय

कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना, रिपोर्ताज, साक्षात्कार आदि विभिन्न विधाओं में निरंतर अपने समय और समाज के यथार्थ को नये ढंग से देखने और रचने के साथ-साथ आलोचना में नित नये प्रश्न उठाने तथा उनके उत्तरों को सृजनशील ढंग से खोजने वाले रचनाकार एवं आलोचक। उच्च शिक्षा और साहित्यिक पत्रकारिता में कार्यरत रहते हुए साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में सतत सक्रिय। बीस कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास, तीन नाटक, कई नुक्कड़ नाटक, चार आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित। नाटकों और नुक्कड़ नाटकों के हिंदी के अतिरिक्त कई भाषाओं में अनेक मंचन और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से प्रसारण। ‘सफाइयाँ’ और ‘लाइ लो’ कहानियों पर इन्हीं नामों से टेलीफिल्में बनी हैं। कई रचनाएँ भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनूदित होकर प्रकाशित। अनेक सम्मान और पुरस्कार।

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