Kahte hain jisko ‘Nazeer’ <br>  कहते हैं जिसको ‘नज़ीर’
Kahte hain jisko ‘Nazeer’
कहते हैं जिसको ‘नज़ीर’
₹270.00 - ₹450.00

Kahte hain jisko ‘Nazeer’
कहते हैं जिसको ‘नज़ीर’

270.00450.00

Author(s) — Dr. Jankiprasad Sharma
लेखक  — डॉ. जानकीप्रसाद शर्मा

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 224 Pages | 2022 | 6 x 9 inches |

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Description

 डॉ. जानकीप्रसाद शर्मा

जानकीप्रसाद शर्मा — जन्म : 5 मार्च, 1950, सिरोंज (विदिशा) मध्यप्रदेश। प्रमुख प्रकाशन– आलोचना : कहते हैं जिसको ‘नज़ीर’; उर्दू अदब के सरोकार; उर्दू साहित्य की परम्परा; गाहे बगाहे; कहानी का वर्तमान; शानी (साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ़); कहानी : एक संवाद; उपन्यास : एक अन्तर्यात्रा; कविता की नई काइनात और रामविलास शर्मा और उर्दू। सम्पादित पुस्तकें : शानी आदमी और अदीब; उर्दू शाइरी का गुलदस्ता (हिन्दी-उर्दू-जापानी में); ‘उद्‍भावना’ पत्रिका के मजाज़, मंटो, इस्मत चुग़ताई और साहिर विशेषांक। शानी रचनावली का सम्पादन (छह खण्डों में)। अनुवाद – उर्दू से हिन्दी अनुवाद की तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों में से तेरह पुस्तकें साहित्य अकादेमी से प्रकाशित। सज्जाद ज़हीर की रौशनाई; निदा फ़ाज़्ली की आत्मकथा दीवारों के बाहर; क़ाज़ी अब्दुस्सत्तार के उपन्यास दाराशिकोह व ग़ालिब के अनुवाद बतौरे-ख़ास उल्लेखनीय। शानी पर लिखे अपने हिन्दी मोनोग्राफ़ का स्वत: कृत उर्दू अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित।
सम्पर्क : बी-330, अशोक नगर, शाहदरा, दिल्ली-110093
मो. नं. : 09811517897

पुस्तक के बारे में

‘आशिक़ है तो दिलबर को हर इक रंग में पहचान।’ नज़ीर अकबराबादी सिर्फ़ ख़ुदा या ईश्वर को पहचानने की बात नहीं कर रहे हैं, मानवीय सार-तत्त्व की पहचान का भाव भी इसमें अन्तर्निहित है। नज़ीर के इस आग्रह का महत्त्व आज दो-ढाई सौ वर्ष बाद और ज़्यादा बढ़ गया है। इस आग्रह के मूल में सांस्कृतिक बहुलता के स्वीकार का जो परिप्रेक्ष्य है, आज वह धार्मिक विद्वेष की ज़द में है। बाक़ी रंगों की उपेक्षा करते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ एक रंग में दिलबर को पहचानने का नज़रिया ज़ोर पकड़ रहा है। धर्मनिरपेक्षता, जो कि हमारे लोकतन्त्र की मूल आत्मा है, की हिमायत करने वालों के देशप्रेम को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। ऐसे मुश्किल व़क्त में प्रगतिशील और उदार जीवन-मूल्यों को पोषित करने वाले नज़ीर और इस धारा के अन्य कवियों की रचनाएँ एक उम्मीद की तरह हैं।
हमारे साहित्यिक परिदृश्य–हिन्दी और उर्दू दोनों– में एक विचित्र विरोधाभास नज़र आता है। दोनों ही साझी विरासत के मूल्य एवं महत्त्व को समझते हुए उसकी हिफ़ाज़त पर बल देते हैं। लेकिन जब साहित्यिक परम्पराओं के मूल्यांकन का मसला आता है, उर्दू आलोचक अपनी रिवायत में कबीर-जायसी तक को शामिल करने में कोताही बरतते हैं, आधुनिक रचनाकारों की बात तो दरगुज़र कीजिये। इसी तरह हिन्दी आलोचक अपने लेखों-वक्तव्यों में उर्दू शे’रों के उपयोग को लेकर जितने उदार हैं, हिन्दी काव्य-परम्परा में उर्दू शाइरों की समाहिति को लेकर उतने ही अनुदार साबित होते हैं। यह एक सामान्य पर्यवेक्षण है; क्योंकि इसके चन्द अनुकरणीय अपवाद भी हैं। दरअस्ल यह स्थिति इसलिए बनी कि हिन्दी और उर्दू के सापेक्ष विकास को समझने का नज़रिया अपेक्षानुरूप विकसित नहीं हो सका है। कमोबेश दोनों ही जगह साहित्येतिहास भी अपनी-अपनी इकहरी परम्परा को दृष्टि में रखकर लिखने की प्रवृत्ति रही है। अतएव दोनों परम्पराओं के बीच आवाजाई के जो पहलू अब तक दृष्टि से ओझल रहे हैं, उन्हें उभार कर सामने लाने की ज़रूरत है। नज़ीर से हम इसमें मदद ले सकते हैं। यह चयन इसीलिए।

…इसी किताब से…

कहीं चौसर और शतरंज होती तो वहाँ भी बैठ जाते। बचपन में कबूतरबाज़ी भी बहुत की और यह शौक़ जीवन-भर रहा। उन्हें कबूतरों के नये-नये रंग पैदा करने के विचित्र उपाय मालूम थे। प्रो. शहबाज़ लिखते हैं कि “जहाँ क़ाबिल लोग उनसे शे’रो-शाइरी में संशोधन कराते थे, वहीं रईस और अमीरज़ादे उनसे कबूतरबाज़ी के गुर सीखने आया करते थे। नज़ीर की विशेषज्ञता देखकर उनके होश उड़ जाते थे।” कबूतरबाज़ी पर उनकी एक न‍़ज्म है। इसमें लगभग पचास प्रकार के कबूतरों के नाम आते हैं।

कबूतरों से इश्क़ की मिसाल यह है–

छोड़ इनको ‘नज़ीर’ अपना दिल किससे लगावें
अपने तो लड़कपन से हैं, दमसाज़ कबूतर

नज़ीर बुलबुलें लड़ाने में भी पीछे नहीं थे। बटेरें भी लड़ाते थे। ये शौक़ नज़ीर के पक्षियों के प्रति अनुराग को दर्शाते हैं। उनकी कविताओं में जहाँ पक्षियों का ज़िक्र आता है, वहाँ नज़ीर की तन्मयता देखने लाइक़ होती है। ये तमाम शग़ल उन्हें हास-परिहास के अवसर प्रदान करते थे।
नज़ीर अकबराबादी अवामी धारा के शाइर थे, लोककवि कहिये। अपने हँसमुख स्वभाव के कारण ही वे लोगों में इतना घुल-मिल सके। मनोविनोद में वे बड़ी गम्भीर बातें कह जाते थे। ‘मुि‍फ्लसी’ न‍़ज्म के दो बन्द ही लिजिये–
आशिक़ के हाल पर भी जब आ मुि‍फ्लसी पड़े

माशूक़ अपने पास न दे उसको बैठने
आवे जो रात को तो निकाले वहीं उसे
इस डर से यानी रात को धन्ना  कहीं न दे

…इसी किताब से…

अनुक्रम

प्राक्कथन

खण्ड एक : जीवन एवं रचनात्मक अवदान

संक्षिप्त जीवन-वृत्त
नज़ीर के धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण का परिप्रेक्ष्य
नज़ीर की कविता : धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का सन्दर्भ
उपसंहार

खण्ड दो : चयन

न‍़ज्में
1. आत्म-चित्र
2. हम्द (बतर्ज़े मुनाजात)
3. नानकशाह गुरु
4. गुरु गंजब़ख्श की वन्दना
5. जनम कन्हैया जी का
6. श्रीकृष्ण और नरसी मेहता
7. हंस-कथा
8. हज़रत सलीम चिश्ती का उर्स
9. ईदगाह अकबराबाद
10. बलदेव जी का मेला
11. शब बरात
12. होली की बहारें
13. दिवाली
14. राखी
15. बसन्त
16. मोती
17. उमस
18. आँधी
19. मौसमे-बरसात
20. जाड़े की बहारें
21. ति़फ्ली (बचपन)
22. जवानी
23. बुढ़ापा
24. मौत
25. आईना
26. ़फ़िरा़क (वियोग)
27. राज़दारी -ए-महबूब (प्रेमी का मर्म)
28. आशिक़ों की भंग
29. दम ़गनीमत है (लौकिक सुख)
30. त़र्गीब सख़ावत-ओ-इशरत
31. तवक्कुल या तर्के-तम्अ (लोभ का परित्याग)
32. वज्द-ओ-हाल (आत्म-विस्मृति)
33. आटे-दाल का भाव (I)
34. आटे-दाल का भाव (II)
35. आदमीनामा
36. दुनिया की नेकी-बदी
37. दुनिया वाले
35. शहर अकबराबाद की तारीफ़
39. रोटियाँ
40. शहर आशोब (आगरे की बदहाली)
41. इ़फ्लास का न‍़क्शा (दरिद्रता का चित्र)
42. बंजारानामा
43. मुि‍फ्लसी
44. पेट का फलस़फा
45. झोंपड़ा
46. कौड़ीनामा
47. रुपया
48. तिल के लड्डू
49. आगरे की ककड़ी
50. कोरा बर्तन
51. रीछ का बच्चा
52. बटुआ
53. पंखा
54. बाला
55. मेंहदी

गज़लें

1. गर्म याँ यूँ तो बहुत हुस्न का बाज़ार रहा
2. जाल में ज़र के अगर मोती का दाना होगा
3. बा हस्बे-अ़क्ल तो कोई नहीं सामान मिलने का
4. अगर उस गुलबदन का दिल में कुछ आसार हो पैदा
5. हो क्यूँ न तेरे काम में हैरान तमाशा
6. दूर से आये थे सा़की सुनके मयख़ाने को हम
7. दिल न लो, दिल का ये लेना है, न इ‍‍‍़ख्फ़ा होगा
8. झमक दिखाते ही उस दिलरुबा ने लूट लिया
9. इश्क़ फिर रंग वो लाया है कि जी जाने है
10. रहें वो श़ख्स जो ब़ज्मे-जहाँ की रौनक़ हैं
11. कहा ये दिल ने मुझे एक दिन कि बा़ग को देख
12. जब हमनशीं! हमारा भी अहदे-शबाब था
13. बहरे-हस्ती में सुहबते-अहबाब

 

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