Junglee Phool (A Novel Based on the Tribes of the Arunachal Pradesh) <br> जंगली फूल (असम की जनजातियों पर आधारित पौराणिक उपन्यास)
Junglee Phool (A Novel Based on the Tribes of the Arunachal Pradesh)
जंगली फूल (असम की जनजातियों पर आधारित पौराणिक उपन्यास)
₹240.00 - ₹350.00

Junglee Phool (A Novel Based on the Tribes of the Arunachal Pradesh)
जंगली फूल (असम की जनजातियों पर आधारित पौराणिक उपन्यास)

Junglee Phool (A Novel Based on the Tribes of the Arunachal Pradesh)
जंगली फूल (असम की जनजातियों पर आधारित पौराणिक उपन्यास)

240.00350.00

10 in stock

Author(s) – Joram Yalam
लेखिका — जोराम यालाम

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 160 Pages | 6 x 9 Inches |

पुस्तक के बारे में

अरुणाचल प्रदेश में 26 मुख्य जनजातीय (Tribal) समाज हैं जिनमें से निशी एक प्रमुख जनजाति है। निशी समाज में प्रचलित लोक कथाओं में एक प्रसिद्ध पुरखे तानी (पिता) को अनेक पत्नियां रखने वाले, प्रेमविहीन, बलात्कारी और आवारा व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो अपनी असाधारण बल-बुद्धि का इस्तेमाल भी सिर्फ औरतें हासिल करने के लिए करता है। लेखिका ने तानी की इस छवि पर सवाल उठाया है। न सिर्फ सवाल उठाया है बल्कि उसकी मूल छवि और उससे जुड़े अन्य मिथकीय प्रसंगों को अपनी कल्पना से फिर से निर्मित करने का बीड़ा उठाया है। इसी का सुफल है यह उपन्यास – जंगली फूल । भारत के जनजातीय समाजों में एक छोटे से शिक्षित बौद्धिक वर्ग द्वारा लिखे जा रहे आधुनिक साहित्य में जंगली फूल एक असाधारण कृति है। यह कृति न सिर्फ निशी जनजाति की ऐतिहासिक जीवन यात्रा और उसकी संस्कृति तथा समाज का एक प्रामाणिक अन्दरूनी चित्र प्रस्तुत करती है बल्कि पूर्वोत्तर की जनजातियों में प्रचलित कुछ अंधविश्वासों, विवेकहीन परम्पराओं, परस्पर युद्धों तथा स्त्रियों पर अत्याचार करने वाली प्रथाओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए सुख-शांति से जीने वाले एक नए समाज का चित्र भी साकार करती है। लेखिका के प्रगतिशील मानवतावादी दृष्टिकोण ने इस उपन्यास के माध्यम से जनजातीय समाजों में एक नवजागरण लाने का प्रयास किया है। प्रेम की महिमा का गुणगान करने वाले इस उपन्यास में कई शक्तिशाली स्त्री चरित्र हैं जिनकी नैसर्गिकता से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह सकते। स्त्री-पुरुष के बीच मित्रता के संबंध को अपना आदर्श घोषित करने वाली यह साहसिक कृति अपनी खूबसूरत और चमत्कारिक भाषा के कारण बेहद पठनीय बन गई है। खुद एक निशी लेखिका द्वारा अपने निशी समाज का प्रामाणिक चित्रण और उसके सामाजिक रूपांतरण का क्रांतिकारी आह्वान जनजातियों में लिखे जा रहे साहित्य में इसे एक दुर्लभ कृति बनाता है।

— वीर भारत तलवार

‘‘जंगली’’ होने का अर्थ मेरे लिए इस प्रकार है–प्रकृति से जुड़ना। उनके साथ स्वयं को अभिन्न अंग जानकर चलना। फूलों के साथ जो मुस्कुरा सके। नदी की बहती लहरों का गान सुन सके। हृदय के अन्तरतम समन्दर से जो सूक्ष्म पुकार आती है–उसे सुन सके। सूरज की स्वर्णिम किरणों-सा बिखर सके। एक हाथ तारों को छूए और दूसरा ज़मीन को। पथरीले शिखरों पर बिखरी चुटकी भर मिट्टी में भी उग-उग आना। क्षण भर खिलकर मर जाना। चाँद न छिटकाए चांदनी, सूरज काली चादर ओढ़े सो जाए, जंगली फूल फिर भी खिलता और महकता रहता है। उन स्थानों पर भी खिलता है जिसकी कल्पना तक हम नहीं कर सकते। यह एक सतत यात्रा होती है। बिल्कुल नदी की तरह। नवीनतम चाल से चलने का साहस। भय का सामना करने का साहस। यही जंगलीपन है। जंगल पक्षपाती नहीं होता। उसमें जो जीवन है, वह तटस्थ है! वहाँ खिलने वाले फूलों की अपनी ही मर्जी और मौज होती है! न मोह, न आसक्ति और न त्याग! सभी तरह के बन्धनों से मुक्त स्वतन्त्रता का नाम जंगल है! वह स्वतन्त्रता, जो परम अनुशासन से उत्पन्न होती है! मौत कदम से कदम मिलाकर चलती रहती है। सतर्कता का नाम जंगल है। चुनौती का नाम जंगल है। जो भटके हुए से लगते हैं, वही रास्ता ढूँढ सकते हैं। जंगल भटका सकता है। लेकिन वही जिंदा भी करता है। बचने का आनंद भी उसी में है। तानी जंगली फूल था! तभी तो वह पिता कहलाया! तभी तो उसने प्रेम को जीया! कोई रुकावट, कोई नियम, कोई डर उसे रोक नहीं पाया। वह उग-उग आता था– हर परिस्थिति में। उग कर खिल जाना ही उसकी परम गति थी। उसके खिलने में जीवन था!

…इसी पुस्तक से…

Description

लेखक के बारे में

जोराम यालाम-अरुणाचल प्रदेश की लोवर-सुबानसिरी जिले के जोराम गाँव में, पाँच मार्च को जन्मी। वर्तमान में राजीव गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत है। पीएच. डी. की उपाधि भी इसी विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 2012 में ‘‘साक्षी है पीपल’’ नामक कहानी संग्रह आया जिसमें 9 लम्बी कहानियाँ हैं। 2014 में एक और कहानी संग्रह ‘‘तानी मोमेन’’ (लोक कथाएँ) आया। अब पहली बार उपन्यास लेखन में उतरी हैं। ‘‘जंगली फूल’’ यालाम का पहला उपन्यास है।

पुस्तक के बारे में

“जंगली” होने का अर्थ मेरे लिए इस प्रकार है–प्रकृति से जुड़ना। उनके साथ स्वयं
को अभिन्न अंग जानकर चलना। फूलों के साथ जो मुस्कुरा सके। नदी की बहती लहरों का गान सुन सके। हृदय के अन्तरतम समन्दर से जो सूक्ष्म पुकार आती है–उसे सुन सके। सूरज की स्वर्णिम किरणों-सा बिखर सके। एक हाथ तारों को छूए और दूसरा ज़मीन को। पथरीले शिखरों पर बिखरी चुटकी भर मिट्टी में भी उग-उग आना। क्षण भर खिलकर मर जाना। चाँद न छिटकाए चांदनी, सूरज काली चादर ओढ़े सो जाए, जंगली फूल फिर भी खिलता और महकता रहता है। उन स्थानों पर भी खिलता है जिसकी कल्पना तक हम नहीं कर सकते। यह एक सतत यात्रा होती है। बिल्कुल नदी की तरह। नवीनतम चाल से चलने का साहस। भय का सामना करने का साहस। यही जंगलीपन है।
जंगल पक्षपाती नहीं होता। उसमें जो जीवन है, वह तटस्थ है! वहाँ खिलने वाले फूलों की अपनी ही मर्जी और मौज होती है! न मोह, न आसक्ति और न त्याग! सभी तरह के बन्धनों से मुक्त स्वतन्त्रता का नाम जंगल है! वह स्वतन्त्रता, जो परम अनुशासन से उत्पन्न होती है! मौत कदम से कदम मिलाकर चलती रहती है। सतर्कता का नाम जंगल है। चुनौती का नाम जंगल है। जो भटके हुए से लगते हैं, वही रास्ता ढूँढ सकते हैं। जंगल भटका सकता है। लेकिन वही जिंदा भी करता है। बचने का आनंद भी उसी में है। तानी जंगली फूल था! तभी तो वह पिता कहलाया! तभी तो उसने प्रेम को जीया! कोई रुकावट, कोई नियम, कोई डर उसे रोक नहीं पाया। वह उग-उग आता था– हर परिस्थिति में। उग कर खिल जाना ही उसकी परम गति थी। उसके खिलने में जीवन था!

इसी पुस्तक से…

 

अरुणाचल प्रदेश में 26 मुख्य जनजातीय (Tribal) समाज हैं जिनमें से निशी एक प्रमुख जनजाति है। निशी समाज में प्रचलित लोक कथाओं में एक प्रसिद्ध पुरखे तानी (पिता) को अनेक पत्नियां रखने वाले, प्रेमविहीन, बलात्कारी और आवारा व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो अपनी असाधारण बल-बुद्धि का इस्तेमाल भी सिर्फ औरतें हासिल करने के लिए करता है। लेखिका ने तानी की इस छवि पर सवाल उठाया है। न सिर्फ सवाल उठाया है बल्कि उसकी मूल छवि और उससे जुड़े अन्य मिथकीय प्रसंगों को अपनी कल्पना से फिर से निर्मित करने का बीड़ा उठाया है। इसी का सुफल है यह उपन्यास – जंगली फूल ।
भारत के जनजातीय समाजों में एक छोटे से शिक्षित बौद्धिक वर्ग द्वारा लिखे जा रहे आधुनिक साहित्य में जंगली फूल एक असाधारण कृति है। यह कृति न सिर्फ निशी जनजाति की ऐतिहासिक जीवन यात्रा और उसकी संस्कृति तथा समाज का एक प्रामाणिक अन्दरूनी चित्र प्रस्तुत करती है बल्कि पूर्वोत्तर की जनजातियों में प्रचलित कुछ अंधविश्वासों, विवेकहीन परम्पराओं, परस्पर युद्धों तथा स्त्रियों पर अत्याचार करने वाली प्रथाओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए सुख-शांति से जीने वाले एक नए समाज का चित्र भी साकार करती है। लेखिका के प्रगतिशील मानवतावादी दृष्टिकोण ने इस उपन्यास के माध्यम से जनजातीय समाजों में एक नवजागरण लाने का प्रयास किया है।
प्रेम की महिमा का गुणगान करने वाले इस उपन्यास में कई शक्तिशाली स्त्री चरित्र हैं जिनकी नैसर्गिकता से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह सकते। स्त्री-पुरुष के बीच मित्रता के संबंध को अपना आदर्श घोषित करने वाली यह साहसिक कृति अपनी खूबसूरत और चमत्कारिक भाषा के कारण बेहद पठनीय बन गई है।
खुद एक निशी लेखिका द्वारा अपने निशी समाज का प्रामाणिक चित्रण और उसके सामाजिक रूपांतरण का क्रांतिकारी आह्वान जनजातियों में लिखे जा रहे साहित्य में इसे एक दुर्लभ कृति बनाता है।

— वीर भारत तलवार

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