Jharkhand Mein Mere Samkaleen <br> झारखंड में मेरे समकालीन
Jharkhand Mein Mere Samkaleen
झारखंड में मेरे समकालीन
₹240.00 - ₹400.00

Jharkhand Mein Mere Samkaleen
झारखंड में मेरे समकालीन

240.00400.00

Author(s) — Vir Bharat Talwar
लेखक — वीर भारत तलवार

| ANUUGYA BOOKS | HINDI| 213 Pages | 2019 | 5.5 x 8.5 Inches |

| available in  PAPER BACK & HARD BOUND |

Description

पुस्तक के बारे में

रामदयाल ने आदिवासियों के धर्म के सवाल को बड़े पैमाने पर उठाने की कोशिश की। यह काम इतनी गम्भीरतापूर्वक भारत के और किसी आदिवासी बुद्धिजीवी ने नहीं किया। रामदयाल दिउड़ी गाँव के मुंडा (प्रधान) के बेटे थे। इसलिए धर्म में शुरू से उनकी रुचि का होना स्वाभाविक है। उनके इलाके में चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव मत का प्रभाव था और गाँव में दुर्गा का एक प्राचीन मन्दिर भी था। रामदयाल हिन्दू धर्म के ग्रन्थों और पौराणिक कथाओं से अच्छी तरह परिचित थे और उन्होंने कई प्रसंगों में इनके बारे में लिखा भी है। इससे ऐसा लगता था मानो वे हिन्दू धर्म के प्रति झुकाव रखते हों। रामदयाल ईसाई चर्च और उसकी सांप्रदायिक गतिविधियों के विरोधी और आलोचक थे। इससे भी हिन्दू धर्म के प्रति उनके झुकाव रखने का सन्देह होता था। लेकिन यह तथ्य नहीं था। हिन्दू धर्म से उनका परिचय सहज ही था, लेकिन वे आदिवासियों को हिन्दू मानने से इनकार करते थे और उन पर किसी भी रूप में हिन्दू धर्म थोपने के सख्त विरोधी थे।

इसी पुस्तक से

इस किताब में मैंने झारखंड की उन शख्सियतों के बारे में लिखा है जिनके सम्पर्क में मैं आया था और जिनके साथ मैंने काम किया। इनमें से कुछ झारखंड के मूल निवासी रहे हैं और कुछ यहाँ रहकर काम करते रहे। इसमें शामिल लेख समय-समय पर दूसरों के आग्रह पर लिखे गए थे। इस किताब के लिए विशेष रूप से सिर्फ एक ही लेख लिखा गया और वह रामदयाल मुंडा पर है। रामदयाल चाहते थे कि मैं उन पर और केशरी जी पर लिखूँ। केशरी जी पर मैंने तभी लिख दिया था। राँची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में केशरी जी के अन्तिम प्रकाशित ग्रन्थ नागपुरी कवि और उनका काव्य पर मैंने एक व्याख्यान दिया था। उसे भी संक्षिप्त करके यहाँ शामिल कर लिया गया है। रामदयाल जी पर लेख उनके जीवनकाल में नहीं लिख सका। उनकी जब मृत्यु हुई, मैं दिल्ली में था। उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दे पाया। अब यह लेख ही उनको मेरी श्रद्धांजलि है।

पुस्तक की भूमिका से

अनुक्रम

आभार
भूमिका
1. स्वाभिमानी बुद्धिजीवी : निर्मल मिंज
2. उपयोगी सूचनाओं के भंडार : दिनेश्वर प्रसाद
3. वी.पी. केशरी-I
एक राजनीतिक बुद्धिजीवी जिस पर कभी बुढ़ापा नहीं आया
4. वी.पी. केशरी–II
केशरी जी की साहित्य साधना : नागपुरी कवि और उनका काव्य
5. विलक्षण विद्वान, प्रशासक और लेखक : कुमार सुरेश सिंह
6. झारखंडी बुद्धिजीवियों के सिरमौर : रामदयाल मुंडा

परिशिष्ट

1. रामदयाल द्वारा सागू मुंडा की किताब मुंडा कोअ: इतिहास
की समीक्षा
2. लेखक के नाम रामदयाल मुंडा के दो पत्र
3. वी.पी. केशरी द्वारा हस्तलिखित पोज़ीशन पेपर का सारांश
4. नदी और उसके संबंधी के पहले संस्करण का कवर
5. दी लैंग्वेज़ ऑफ पोएट्री का कवर

लेखक के बारे में

वीर भारत तलवार
जन्म : 20 सितम्बर, 1947, जमशेदपुर, झारखंड।
शिक्षा : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी.। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दो बार फेलो। जेएनयू में 24 वर्ष अध्यापन।
तीन पत्रिकाओं – पटना से फिलहाल (1972-74), धनबाद से शालपत्र (1977-78) और रांची से झारखंड वार्ता (1977-78) का प्रकाशन और संपादन। झारखंड आन्दोलन में और रांची विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषाओं का विभाग खुलवाने में विशेष भूमिका।
प्रकाशन : किसान राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचंद : 1918-22 (1990); राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य (1993); 19वीं सदी में हिन्दू नवजागरण की विचारधारा: सत्यार्थ प्रकाश (2001); रस्साकशी (2002); राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद : प्रतिनिधि संकलन (संपादन, 2004); राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद (मोनोग्राफ, 2005); नक्सलबाड़ी के दौर में (संपादन, 2007); झारखंड के आदिवासियों के बीच (2008, झारखंड आन्दोलन के दस्तावेज (संपादन, 2016)।
सम्मान : भगवान बिरसा पुरस्कार (1988-89) तथा झारखंड रत्न की उपाधि से विभूषित (2003)।
संपर्क : मो. 9560857548
Email : virbharattalwar@gmail.com

 

Additional information

Weight N/A
Dimensions N/A
Binding Type

,

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Jharkhand Mein Mere Samkaleen
झारखंड में मेरे समकालीन”

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »
This website uses cookies. Ok