Bans ka Kila <br>बाँस का किला (आदिवासी परिप्रेक्ष्य की कहानियाँ)
Bans ka Kila
बाँस का किला (आदिवासी परिप्रेक्ष्य की कहानियाँ)
₹350.00   ₹280.00

Bans ka Kila
बाँस का किला (आदिवासी परिप्रेक्ष्य की कहानियाँ)

Bans ka Kila
बाँस का किला (आदिवासी परिप्रेक्ष्य की कहानियाँ)

280.00

8 in stock

Author(s)Narmedeshwar
लेखक — नर्मदेश्वर

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 119 Pages | HARD BOUND | 2020 |
| 5.5 x 8.5 inches | 400 grams |
ISBN : 978-93-89341-23-2 |

पुस्तक के बारे में

नर्मदेश्वर यथार्थ को अपनी कल्पना से लैस कर आंचलिक शब्दावली को सुगमतर करने और यथार्थ की बारीक पहचान करने वाले महीन शिल्प के कुशल कथाकार हैं। शिल्प की सादगी अपनी जगह, लेकिन पात्रों और उनके आस-पास के परिवेश को जिन्दा रखने की कारीगरी के धनी कथाकार हैं नर्मदेश्वर। ‘बाँस का किला’ आदिवासी जीवन और परिदृश्य पर आधारित उनकी तेरह कहानियों का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है। मनरेगा के आते ही मजदूरों के जीवन में रोशनी आयी (आषाढ़ का पहला दिन), उनके तेवर बदले, अब वे मालिक की नहीं सुनते लेकिन उनकी फसल को बारिश से बर्बाद होते भी नहीं देख सकते। नर्मदेश्वर के कहानी का यथार्थ भी बहुत निर्दयी है और पलक के ठहर जाने जैसा है। एक दिन बछड़ा गाय का दूध पी गया (बड़ा खाना), गाम के मालिक ने अपने नौकर को इतना पीटा कि वह बेजान पड़ा रहा, फिर मालिक ने उसे रातभर भैंसों के गोहार में बन्द कर दिया। ऐसा निष्ठुर यथार्थ आज की कहानियों में विरले मिलता है। नर्मदेश्वर की कहानियों में पशुधन पर आश्रितों की गाथा है (‘बाँस का किला’ और ‘बड़ा खाना’)। मुर्गे-मुर्गियों और सूअरों पर आश्रितों के सहारे छिन जाने के बाद उनके जीवन में रहता ही क्या है? असंगठित क्षेत्रों के अधिकांश मजदूरों की कथा में कहीं टिरंगा है तो कहीं साँझू। इसलिये इनकी पीड़ा को इनके वर्तमान से ही नहीं समझा जा सकता है। इनके अतीत की भी पूरी दास्तान नर्मदेश्वर के रचना संसार में रचा-बसा है। नर्मदेश्वर के कथा-संसार में दूरदर्शी यथार्थ के कई संकेत मिलते हैं। इस कथाकार की नजर बड़ी पैनी और आगे की ओर असर करने वाली है। ‘बाँस का किला’ की कहानियाँ देखे-जानेवाले परिवेश का अखबार नामा प्रस्तुत नहीं करती। यह कथाकार की कुशलता भी है और प्रचलित यथार्थ के भीतर उसका हस्तक्षेप भी।

अरुण कुमार, आलोचक, राँची

नर्मदेश्वर हिन्दी कहानी का एक महत्त्वपूर्ण नाम है। ‘बाँस का किला’ आदिवासी जीवन और परिदृश्य पर आधारित उनकी तेरह कहानियों का संग्रह है। नर्मदेश्वर बिहार के रोहतास और कैमूर जिलों और छत्तीसगढ़ के जशपुर और सरगुजा जिलों के आदिवासी जीवन से बचपन से परिचित रहे हैं। ‘जुर्म’ कहानी रोहतास जिले के वनाश्रित लकड़हारों की व्यथा-कथा है और ‘हल-जुआठ’ कुछ मुंडा लोककथाओं का पुनर्सृजन है। शेष कहानियाँ छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक गाँव पर केन्द्रित हैं जिसकी गतिविधियों का साक्षी बूढ़ा पहाड़ है। ‘बाँस का किला’ की सोमा, ‘बिजली चट्टान’ की रूपा, ‘पेड़’ की पेची एवं ‘धूप’ के साँफू, ‘मोर नाम जिन्दाबाद’ के रूँगटू और ‘बड़ा खाना’ के टिरंगा जैसे चरित्रों का सृजन उसी कथाकार के लिए सम्भव है जो आदिवासी जीवन के प्रसंगों और परिदृश्य से पूरी तरह परिचित हो और उनकी संस्कृति से आत्मीय सम्बन्ध रखता हो। ‘बाँस का किला’ की कहानियाँ आदिवासी जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित करती हैं और समकालीन आदिवासी लेखन की चुनौती को पूरा कर

अनुक्रम

  • बाँस का किला
  • आषाढ़ का पहला दिन
  • बीज
  • बिजली चट्टान
  • धूप
  • जुर्म
  • पेड़
  • मोर नाम जिन्दाबाद
  • बड़ा खाना
  • सूप का संगीत
  • हल-जुआठ
  • मंजिल-माटी
  • पहाड़

8 in stock

Description

नर्मदेश्वर

जन्म – बिहार के रोहतास जिले के सिकरियाँ गाँव में 1946 में।
शिक्षा – एम.ए. (अँग्रेजी), बी.एल., पटना विश्वविद्यालय से।
कृतित्व – एक दशक तक सासाराम न्यायालय
में वकालत। यहीं से साहित्यिक पत्रिका ‘अब’ का समवेत संयोजन-सम्पादन। दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका ‘परिकथा’ के आरम्भिक अंकों में सम्पादन सहयोग। इसी पत्रिका के ‘चौपाल’ स्तम्भ के अन्तर्गत लगातार तीन वर्षों से कहानी-लेखन। ‘पहाड़’ कहानी ओशियाकि सुजुकि, टोक्यो द्वारा विश्व हिन्दी लेखक कोश के लिए आमन्त्रित और प्रेषित। कुछ कहानियों का पंजाबी और राजस्थानी में अनुवाद। अँग्रेजी कविताओं का एक चयन ‘एक एकड़ घास’ और दूसरा चयन ‘हरिअर वन में पेड़ तरे’ हिन्दी और भोजपुरी में शीघ्र प्रकाश्य।
सम्प्रति – कृषिकर्म एवं स्वतन्त्र लेखन।
कृतियाँ – जलदेवता (कहानी-संग्रह); नील का दाग (कहानी-संग्रह); आग की नदी (कविता-संग्रह)।
संपर्क – ग्राम एवं डाकघर-सिकरियाँ, सासाराम, बिहार-821113 / न्यू एरिया, नालापथ (चर्च के पास), सासाराम, बिहार-821115
मोबाइल– 8757075977, 7061254085

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Bans ka Kila
बाँस का किला (आदिवासी परिप्रेक्ष्य की कहानियाँ)”

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »
This website uses cookies. Ok