Aam Aadmi ki Kavita
आम आदमी की कविता

225.00

6 in stock

Author(s) – Ajit Chunnilal Chauhan
लेखक — अजित चुनिलाल चव्हाण

| ANUUGYA BOOKS | HINDI | 80 Pages | HARD BACK | 2020 |
| 5.5 x 8.5 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-41-6 |

पुस्तक के बारे में

…मनुष्य को बनाने-सँवारने में समाज की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। और महत्त्वपूर्ण होते हैं समाज में स्थित लोग, जिन्हें प्रत्यक्ष मिलने पर ही जाना जा सकता है। ऐसे लोग अपने-आप में ही कविता होते हैं। हर बार कविता अपने-आप जेहन में नहीं उभरती। और ऐसा भी नहीं है कि वह कागज पर तथा अपनी ही होती है। इसके लिए समाज मन से मेल-मिलाप आवश्यक है। विशेष और साधारण न होने वाला आदमी केवल आदमी होता है। और उसे आदमी ही रहना चाहिए। लेकिन समय सबके लिए एक-सा नहीं होता, इसलिए आदमी-आदमी में अन्तर पड़ना स्वाभाविक है। आज मूल्य संस्कारों से जुड़े रहने वाले लोगों और स्वार्थी लोगों में अलगाव हो गया। परिणामस्वरूप खास बनने की होड़ में शामिल लोगों द्वारा आम आदमी पीछे धकेल दिया गया। उसके आगे बढ़ने के साजो-सामान को तहस-नहस किया जा रहा है। फिर भी बिना किसी तकरार के अपनी हाशिये पर सरका दी गई जिन्दगी को वह जी रहा है। उपनिवेशवाद और बाजारवाद के इस नये दौर में भी उसे आशा की किरण शायद नज़र नहीं आती। आम आदमी अपनी लगन, ईमानदार मेहनत में कोई कमी नहीं रख रहा, बावजूद इसके अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा है। दो व़क्त की भरपेट रोटी खा सकने वाला आदमी मेरी श्रद्धा और भक्ति का विषय है। लेकिन दो व़क्त की रोटी के जुगाड़ ने उसकी भटकन को और भी बढ़ा दिया है। ऐसे आर्थिक रूप से शोषित और कमजोर आदमी ने अपने-आपको विवश ही पाया है। आज उसकी इस विवशता को दूर कर सकने वाले हाथों की बहुत जरूरत है। यहाँ उसके दु:ख को अपनी जबान में कहने का मेरा यह लघु प्रयास है। आम आदमी की समस्याओं के साथ, उसकी सोच, छटपटाहट, जीवन जीने की जिजीविषा को जानने-समझने की कोशिश है। उसे सम्मान दिलाने का छोटा-सा प्रयास-भर है।

– अजित चुनिलाल चव्हाण

6 in stock

Description

पुस्तक के बारे में

…मनुष्य को बनाने-सँवारने में समाज की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। और महत्त्वपूर्ण होते हैं समाज में स्थित लोग, जिन्हें प्रत्यक्ष मिलने पर ही जाना जा सकता है। ऐसे लोग अपने-आप में ही कविता होते हैं। हर बार कविता अपने-आप जेहन में नहीं उभरती। और ऐसा भी नहीं है कि वह कागज पर तथा अपनी ही होती है। इसके लिए समाज मन से मेल-मिलाप आवश्यक है। विशेष और साधारण न होने वाला आदमी केवल आदमी होता है। और उसे आदमी ही रहना चाहिए। लेकिन समय सबके लिए एक-सा नहीं होता, इसलिए आदमी-आदमी में अन्तर पड़ना स्वाभाविक है। आज मूल्य संस्कारों से जुड़े रहने वाले लोगों और स्वार्थी लोगों में अलगाव हो गया। परिणामस्वरूप खास बनने की होड़ में शामिल लोगों द्वारा आम आदमी पीछे धकेल दिया गया। उसके आगे बढ़ने के साजो-सामान को तहस-नहस किया जा रहा है। फिर भी बिना किसी तकरार के अपनी हाशिये पर सरका दी गई जिन्दगी को वह जी रहा है। उपनिवेशवाद और बाजारवाद के इस नये दौर में भी उसे आशा की किरण शायद नज़र नहीं आती। आम आदमी अपनी लगन, ईमानदार मेहनत में कोई कमी नहीं रख रहा, बावजूद इसके अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा है। दो व़क्त की भरपेट रोटी खा सकने वाला आदमी मेरी श्रद्धा और भक्ति का विषय है। लेकिन दो व़क्त की रोटी के जुगाड़ ने उसकी भटकन को और भी बढ़ा दिया है। ऐसे आर्थिक रूप से शोषित और कमजोर आदमी ने अपने-आपको विवश ही पाया है। आज उसकी इस विवशता को दूर कर सकने वाले हाथों की बहुत जरूरत है। यहाँ उसके दु:ख को अपनी जबान में कहने का मेरा यह लघु प्रयास है। आम आदमी की समस्याओं के साथ, उसकी सोच, छटपटाहट, जीवन जीने की जिजीविषा को जानने-समझने की कोशिश है। उसे सम्मान दिलाने का छोटा-सा प्रयास-भर है।

– अजित चुनिलाल चव्हाण

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