Nature / प्रकृति

/Nature / प्रकृति
  • Author(s)Ajit Singnar लेखक — अजित सिंगनर

    Assamese to Hindi Translation by Dinkar Kumar अनुवादक दिनकर कुमार (मूल असमिया से हिन्दी में)

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI | 126 Pages | PAPER BACK | 2020 | | 6 x 9 Inches | 350 grams | ISBN : 978-93-89341-39-3 |

    पुस्तक के बारे में

    लोककथा, किंवदन्ती, विशाल पारम्परिक रीति-नीति, लोकगीत, लोकनृत्य आदि के साथ कार्बी एक समृद्ध जाति है। इस जाति के बीच समय-समय पर पैदा हुए लोक-कवियों ने विभिन्न समय जाति के समक्ष घटी विभिन्न घटनाओं को यत्नपूर्वक गीत के जरिए सँजोने की कोशिश की थी। अगर उन्होंने गीतों के जरिए नहीं संजोया होता तो हमलोग उन घटनाओं के बारे में कुछ नहीं जान पाते। उन अनाम सर्जक कवियों ने हमें विभिन्न कथाएँ उपहार के तौर पर दी ही हैं, साथ ही इतिहास के सूत्र भी दिए हैं। इसीलिए लोक-कविगण हमारे लिए चिर पूजनीय हैं। उन लोगों ने जिन कथाओं, किंवदन्तियों को सँजोया है, उनमें हाई की कहानी प्रमुख है। इसे तमाम कार्बी लोग सच्ची घटना ही मानते हैं। स्थान के अनुसार इस कहानी का स्वरूप बदलता रहता है मगर इसका मर्म एक ही है। कुछ शोधपरक दृष्टि से विश्लेषण कर इसकी मूल कथा की खोज करनी होगी। मेरे मामले में भी वैसा ही हुआ। हाई की कथा से सम्बन्धित कई लेख पढ़कर मैं उलझन में पड़ गया। किसी लेख में लंग दिली को राजा दर्शाया गया है और किसी में महामन्त्री, किसी लेख में साई रंगहा को पिनपो पद के लालच में हाई के साथ लंग दिली का ब्याह करवाते हुए दर्शाया गया है, तो किसी लेख में साई पर लंग दिली को दवाब डालते हुए दिखाया गया है, किसी में लंग दिली को मरते हुए नहीं दिखाकर पछताते हुए दिखाया गया है तो किसी में हाई को लंग दिली की हत्या करते हुए दिखाया गया है इत्यादि-इत्यादि। इसीलिए तथ्यों की ठीक से पड़ताल करने की जरूरत महसूस हुई। आखिरकार तथ्यों का ठीक से विश्लेषण कर विश्वसनीय नजर आने वाली एक कहानी का निर्माण किया। मेरा मानना है कि इस कहानी को वास्तविक रूप से सच माना जा सकता है हालाँकि गुणियों को कोई चूक भी दिखाई दे सकती है। त्रुटि की तरफ संकेत करने पर कृतज्ञ रहूँगा।

    ...इसी पुस्तक से...

    लड़की ने हाँफते हुए लड़के की तरफ देखकर कहा–‘लंग, यह बालूचर बहुत अच्छा लगता है, है ना? मुझे तो बहुत अच्छा लगता है।’ ‘हाँ हाई, मुझे भी अच्छा लगता है।’ लंग ने तुरन्त जवाब दिया। ‘जूमतली तक आने पर मैं एक बार इधर जरूर आता हूँ।’ ‘मैं भी आती हूँ। बहुत अच्छा लगता है। आओ हम घरौंदे बनाते हैं।’ लंग हाई के करीब आ गया। दोनों उत्साह के साथ घरौंदा बनाने में जुट गए। उनके पसीने से भीगे हुए हाथ में रेत चिपकी हुई है, शरीर पर भी रेत है। लेकिन इसकी तरफ उनका ध्यान नहीं है। वे केवल घरौंदा बनाने में जुटे हुए हैं। कुछ रेत एकत्रित करने के बाद लंग ने रेत के ढेर के अन्दर एक बिल का निर्माण किया। उसने कहा– ‘देख रही हो हाई, यह है घर के अन्दर जाने का रास्ता।’ ‘इसका मतलब यह घर बन गया है। कुछ मत करना। यह हमारा घर है। ’ ‘हमारा घर यानी?’–लंग ने चौंक कर पूछा। ‘क्यों जब हमारा विवाह हो जाएगा तो रहने के लिए घर की जरूरत होगी ना?’ ‘तुम्हें कैसे पता चला कि हमारा विवाह होगा?’ ‘जानती हूँ, हमारा विवाह होना ही पड़ेगा।’ ‘ठीक है, जाने दो जाने दो। चलो अभी नदी के पानी में उतरते हैं।’ लंग और हाई नदी की धारा की तरफ दौड़कर गए। गर्मी का मौसम होने की वजह से नदी के इस तरफ पानी कम है। दूसरे किनारे की तरफ पानी ज्यादा है और कुछ गहराई भी है। घुटने तक पानी में दोनों खुश होकर चलने लगे। लंग की आँखें पानी में मौजूद मछलियों पर भी थीं।

    ...इसी पुस्तक से...

  • Author(s)Jacinta Kerketta लेखक — जसिंता केरकेट्टा

    Translated to English by Bhumika Chawla-d’Souza, Vijay K. Chhabra & Fr. Cyprian Ekka

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI-ENGLISH (DIGLOT) | 160 Pages | PAPER BACK | 2021 | | 5.5 x 8.5 Inches | 400 grams | ISBN : 978-93-89341-62-1 |

    पुस्तक के बारे में

    साहित्य में आरक्षण नहीं होता पिछले दिनों एक सम्मान समारोह में भाग लेने के लिए दिल्ली गया था। समारोह की अध्यक्षता एक प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक के सम्पादक कर रहे थे। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि “साहित्य में आरक्षण नहीं होता”। सम्भवतः उन्होंने ऐसा इसलिए कहा कि सम्मान पानेवालों में से कुछ लोग आरक्षित वर्ग से थे। हम उनसे सहमत हैं कि साहित्य में आरक्षण नहीं होता। लेकिन, साहित्य में मनुष्यता की बेहतरी के लिए अन्वेषण जारी रहता है। एक रचनाकार एक नया सच, एक नया परिवेश, एक अनदेखी दुनिया के बारे कहने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहता है। सफलता, असफलता और लगातार अभ्यास के बाद वह छपता है और अनेक कठिनाइयों, समस्याओं को झेलने के बाद उसका संग्रह प्रकाशित हो पाता है। ऐसे में एक नवोदित कवि का पहला संग्रह प्रकाशित होना निश्चय ही उसके शुभचिन्तकों, पाठकों एवं साहित्य प्रेमियों के लिए भी एक सुखद घटना है। जसिन्ता केरकेट्टा बहुत कम समय में, अपनी सृजनात्मकता एवं सक्रियता से हिन्दी साहित्य जगत में, पहचान बनाने में सफल रहीं हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में परिवेश-विशेष को जिस सजगता और प्रखरता से परिचय कराया है, वह कविता प्रेमियों के लिए एक नया अनुभव है। उनकी कविताओं में आदिवासी समाज का दुख, दर्द, ग़ुस्सा, आक्रोश उभर कर आया है। इसके अलावा जसिन्ता ने अपनी कविताओं में आदिवासी स्त्री की स्थिति को भी आत्मीयता से समझने का प्रयास किया है। There is no Reservation in Literature! I recently went to Delhi to participate in an award ceremony. The function was presided over by the editor of a prestigeous Hindi Daily. In his presidential address he said, “There is no reservation in literature!” He might have said so, because some of the decorated persons hailed from the reserved category. I agree, there is no reservation in literature. Yet, literary research continues unabated for the betterment of humanity. The creative writer always strives to comment on a new truth, a new millieu and an unseen world. After success, failure and consistent practice, that work gets printed and facing considerable difficulties that collection gets published. All things considered, the publication of the first volume of a rising poet is indeed a delight to her well-wishers, readers and literature lovers. Jacinta Kerketta has in a short time succeeded in becoming acclaimed in the Hindi literary world due to her consistent creativity. The alertness and efficiency with which she has introduced a particular context in her verses, is a new experience to poetry lovers. Her poems effectively convey the pain, anguish and anger of the indigenous tribal society. Additionally, Jacinta has sought to empathetically understand the tribal woman’s plight through her poems.
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    Author(s) – Joram Yalam लेखिका — जोराम यालाम

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI | 160 Pages | 6 x 9 Inches |

    पुस्तक के बारे में

    अरुणाचल प्रदेश में 26 मुख्य जनजातीय (Tribal) समाज हैं जिनमें से निशी एक प्रमुख जनजाति है। निशी समाज में प्रचलित लोक कथाओं में एक प्रसिद्ध पुरखे तानी (पिता) को अनेक पत्नियां रखने वाले, प्रेमविहीन, बलात्कारी और आवारा व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो अपनी असाधारण बल-बुद्धि का इस्तेमाल भी सिर्फ औरतें हासिल करने के लिए करता है। लेखिका ने तानी की इस छवि पर सवाल उठाया है। न सिर्फ सवाल उठाया है बल्कि उसकी मूल छवि और उससे जुड़े अन्य मिथकीय प्रसंगों को अपनी कल्पना से फिर से निर्मित करने का बीड़ा उठाया है। इसी का सुफल है यह उपन्यास - जंगली फूल । भारत के जनजातीय समाजों में एक छोटे से शिक्षित बौद्धिक वर्ग द्वारा लिखे जा रहे आधुनिक साहित्य में जंगली फूल एक असाधारण कृति है। यह कृति न सिर्फ निशी जनजाति की ऐतिहासिक जीवन यात्रा और उसकी संस्कृति तथा समाज का एक प्रामाणिक अन्दरूनी चित्र प्रस्तुत करती है बल्कि पूर्वोत्तर की जनजातियों में प्रचलित कुछ अंधविश्वासों, विवेकहीन परम्पराओं, परस्पर युद्धों तथा स्त्रियों पर अत्याचार करने वाली प्रथाओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए सुख-शांति से जीने वाले एक नए समाज का चित्र भी साकार करती है। लेखिका के प्रगतिशील मानवतावादी दृष्टिकोण ने इस उपन्यास के माध्यम से जनजातीय समाजों में एक नवजागरण लाने का प्रयास किया है। प्रेम की महिमा का गुणगान करने वाले इस उपन्यास में कई शक्तिशाली स्त्री चरित्र हैं जिनकी नैसर्गिकता से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह सकते। स्त्री-पुरुष के बीच मित्रता के संबंध को अपना आदर्श घोषित करने वाली यह साहसिक कृति अपनी खूबसूरत और चमत्कारिक भाषा के कारण बेहद पठनीय बन गई है। खुद एक निशी लेखिका द्वारा अपने निशी समाज का प्रामाणिक चित्रण और उसके सामाजिक रूपांतरण का क्रांतिकारी आह्वान जनजातियों में लिखे जा रहे साहित्य में इसे एक दुर्लभ कृति बनाता है।

    — वीर भारत तलवार

    ‘‘जंगली’’ होने का अर्थ मेरे लिए इस प्रकार है–प्रकृति से जुड़ना। उनके साथ स्वयं को अभिन्न अंग जानकर चलना। फूलों के साथ जो मुस्कुरा सके। नदी की बहती लहरों का गान सुन सके। हृदय के अन्तरतम समन्दर से जो सूक्ष्म पुकार आती है–उसे सुन सके। सूरज की स्वर्णिम किरणों-सा बिखर सके। एक हाथ तारों को छूए और दूसरा ज़मीन को। पथरीले शिखरों पर बिखरी चुटकी भर मिट्टी में भी उग-उग आना। क्षण भर खिलकर मर जाना। चाँद न छिटकाए चांदनी, सूरज काली चादर ओढ़े सो जाए, जंगली फूल फिर भी खिलता और महकता रहता है। उन स्थानों पर भी खिलता है जिसकी कल्पना तक हम नहीं कर सकते। यह एक सतत यात्रा होती है। बिल्कुल नदी की तरह। नवीनतम चाल से चलने का साहस। भय का सामना करने का साहस। यही जंगलीपन है। जंगल पक्षपाती नहीं होता। उसमें जो जीवन है, वह तटस्थ है! वहाँ खिलने वाले फूलों की अपनी ही मर्जी और मौज होती है! न मोह, न आसक्ति और न त्याग! सभी तरह के बन्धनों से मुक्त स्वतन्त्रता का नाम जंगल है! वह स्वतन्त्रता, जो परम अनुशासन से उत्पन्न होती है! मौत कदम से कदम मिलाकर चलती रहती है। सतर्कता का नाम जंगल है। चुनौती का नाम जंगल है। जो भटके हुए से लगते हैं, वही रास्ता ढूँढ सकते हैं। जंगल भटका सकता है। लेकिन वही जिंदा भी करता है। बचने का आनंद भी उसी में है। तानी जंगली फूल था! तभी तो वह पिता कहलाया! तभी तो उसने प्रेम को जीया! कोई रुकावट, कोई नियम, कोई डर उसे रोक नहीं पाया। वह उग-उग आता था– हर परिस्थिति में। उग कर खिल जाना ही उसकी परम गति थी। उसके खिलने में जीवन था!

    ...इसी पुस्तक से...

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    Author(s) — Kedar Prasad Meena लेखक — केदार प्रसाद मीणा

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 184 Pages | PAPER BOUND | 2014 | | 5.5 x 8.5 Inches | 350 grams | ISBN : 978-93-83962-76-1 |

  • Author(s) — Kedar Prasad Meena लेखक — केदार प्रसाद मीणा

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 160 Pages | PAPER BOUND | 2016 | | 5.5 x 8.5 Inches | 350 grams | ISBN : 978-93-83962-95-2 |

  • Author(s) — Mahadev Toppo लेखक — महादेव टोपो

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 96 Pages | PAPER BOUND | 2017 | | 5.5 x 8.5 Inches | 250 grams | ISBN : 978-93-83962-79-2 |

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