2021

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    Author(s) – Joram Yalam लेखिका — जोराम यालाम

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI | 160 Pages | 6 x 9 Inches |

    पुस्तक के बारे में

    अरुणाचल प्रदेश में 26 मुख्य जनजातीय (Tribal) समाज हैं जिनमें से निशी एक प्रमुख जनजाति है। निशी समाज में प्रचलित लोक कथाओं में एक प्रसिद्ध पुरखे तानी (पिता) को अनेक पत्नियां रखने वाले, प्रेमविहीन, बलात्कारी और आवारा व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो अपनी असाधारण बल-बुद्धि का इस्तेमाल भी सिर्फ औरतें हासिल करने के लिए करता है। लेखिका ने तानी की इस छवि पर सवाल उठाया है। न सिर्फ सवाल उठाया है बल्कि उसकी मूल छवि और उससे जुड़े अन्य मिथकीय प्रसंगों को अपनी कल्पना से फिर से निर्मित करने का बीड़ा उठाया है। इसी का सुफल है यह उपन्यास - जंगली फूल । भारत के जनजातीय समाजों में एक छोटे से शिक्षित बौद्धिक वर्ग द्वारा लिखे जा रहे आधुनिक साहित्य में जंगली फूल एक असाधारण कृति है। यह कृति न सिर्फ निशी जनजाति की ऐतिहासिक जीवन यात्रा और उसकी संस्कृति तथा समाज का एक प्रामाणिक अन्दरूनी चित्र प्रस्तुत करती है बल्कि पूर्वोत्तर की जनजातियों में प्रचलित कुछ अंधविश्वासों, विवेकहीन परम्पराओं, परस्पर युद्धों तथा स्त्रियों पर अत्याचार करने वाली प्रथाओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए सुख-शांति से जीने वाले एक नए समाज का चित्र भी साकार करती है। लेखिका के प्रगतिशील मानवतावादी दृष्टिकोण ने इस उपन्यास के माध्यम से जनजातीय समाजों में एक नवजागरण लाने का प्रयास किया है। प्रेम की महिमा का गुणगान करने वाले इस उपन्यास में कई शक्तिशाली स्त्री चरित्र हैं जिनकी नैसर्गिकता से प्रभावित हुए बिना हम नहीं रह सकते। स्त्री-पुरुष के बीच मित्रता के संबंध को अपना आदर्श घोषित करने वाली यह साहसिक कृति अपनी खूबसूरत और चमत्कारिक भाषा के कारण बेहद पठनीय बन गई है। खुद एक निशी लेखिका द्वारा अपने निशी समाज का प्रामाणिक चित्रण और उसके सामाजिक रूपांतरण का क्रांतिकारी आह्वान जनजातियों में लिखे जा रहे साहित्य में इसे एक दुर्लभ कृति बनाता है।

    — वीर भारत तलवार

    ‘‘जंगली’’ होने का अर्थ मेरे लिए इस प्रकार है–प्रकृति से जुड़ना। उनके साथ स्वयं को अभिन्न अंग जानकर चलना। फूलों के साथ जो मुस्कुरा सके। नदी की बहती लहरों का गान सुन सके। हृदय के अन्तरतम समन्दर से जो सूक्ष्म पुकार आती है–उसे सुन सके। सूरज की स्वर्णिम किरणों-सा बिखर सके। एक हाथ तारों को छूए और दूसरा ज़मीन को। पथरीले शिखरों पर बिखरी चुटकी भर मिट्टी में भी उग-उग आना। क्षण भर खिलकर मर जाना। चाँद न छिटकाए चांदनी, सूरज काली चादर ओढ़े सो जाए, जंगली फूल फिर भी खिलता और महकता रहता है। उन स्थानों पर भी खिलता है जिसकी कल्पना तक हम नहीं कर सकते। यह एक सतत यात्रा होती है। बिल्कुल नदी की तरह। नवीनतम चाल से चलने का साहस। भय का सामना करने का साहस। यही जंगलीपन है। जंगल पक्षपाती नहीं होता। उसमें जो जीवन है, वह तटस्थ है! वहाँ खिलने वाले फूलों की अपनी ही मर्जी और मौज होती है! न मोह, न आसक्ति और न त्याग! सभी तरह के बन्धनों से मुक्त स्वतन्त्रता का नाम जंगल है! वह स्वतन्त्रता, जो परम अनुशासन से उत्पन्न होती है! मौत कदम से कदम मिलाकर चलती रहती है। सतर्कता का नाम जंगल है। चुनौती का नाम जंगल है। जो भटके हुए से लगते हैं, वही रास्ता ढूँढ सकते हैं। जंगल भटका सकता है। लेकिन वही जिंदा भी करता है। बचने का आनंद भी उसी में है। तानी जंगली फूल था! तभी तो वह पिता कहलाया! तभी तो उसने प्रेम को जीया! कोई रुकावट, कोई नियम, कोई डर उसे रोक नहीं पाया। वह उग-उग आता था– हर परिस्थिति में। उग कर खिल जाना ही उसकी परम गति थी। उसके खिलने में जीवन था!

    ...इसी पुस्तक से...

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    Editor(s) — Kamlesh Verma, Suchita Verma, Anand Bihari सम्पादक — कमलेश वर्मा, सुचिता वर्मा, आनन्द बिहारी

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI | 368 Pages | HARD BOUND | 2021 | | 6 x 9 Inches | 450 grams | ISBN : 978-93-86835-61-1 | 12 COLOUR PAGES |

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    Author(s) — Shankar लेखक — शंकर

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 184 Pages | HARD BOUND | 2021 | |6 x 9 Inches | 400 grams | ISBN : 978-93-89341-19-5 |

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    Author(s)Urmila Shukla लेखिका उर्मिला शुक्ल

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI | 196 Pages |

  • Author(s) — Jumsi Siram ‘Nino’ लेखक — जुमसी सिराम ‘नीनो’

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 96 Pages | PAPER BOUND | 2021 | | 5 x 8 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-68-3 |

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    Author(s) — Bhartendu Mishra लेखक — भारतेन्दु मिश्र

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 120 Pages | 6 x 9 Inches | 2021 |

    | available in PAPER BOUND & HARD BOUND |

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    Author(s)JORAM YALAM लेखक — जोराम यालाम

    English Translation by Dr. Gopal Sharma edited by Nabam Vivek डॉ. गोपाल शर्मा द्वारा हिन्दी से अंग्रेजी में अनुदित

     

     | ANUUGYA BOOKS | ENGLISH | 168 Pages | PAPER BOUND | 2021 | | 6 x 9 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-34-8 |

    पुस्तक के बारे में

    There are 26 main tribal societies in Arunachal Pradesh and Tani tribes (Adi, Nysee, Apatani, Galo and Tagin) is one of the most prominent ones. Tani (father), the famed ancestor is made known in the society through popular folk tales. He is depicted as a polygamous, loveless, lustful, vagabond and ruthless rapist. He is one who uses his extraordinary vigour, vitality and wisdom only to acquire women. His image portrayed so far has been very different and squarely down to earth. Yalam not only very brilliantly breaks this myth but also artfully reconstructs a new modified Tani using her skill of storytelling and imaginative deftness. The result of her art is this novel - Wild Flower. The novel is an extraordinary creation of a creative mind. This work not only presents a historical life-journey of Tani tribes but also its culture and society’s authentic internal image. The novel is also successful in portraying some of the traditions, blind beliefs, internal and external fights and customs related to rampant torture of women. It also becomes a mouthpiece for the oppressed and those who wish to live in peace in the now-found society. The writer’s progressive humane point of view is aimed at transforming the wide-spread tribal society. In modern literature being written by a small educated intellectual class in India’s tribal societies, the novel celebrates the glory of love in numerous forms. There are many powerful feminine characters we cannot live without being influenced by their instinctive naturalness. This bold work proclaims the relationship between men and women as its ideal and has become very readable due to its beautiful and ornate language. The authentic depiction of her society and her revolutionary call for social transformation makes the novel a rare work in the literature being written there.

    – Vir Bharat Talwar, Jawaharlal Nehru University, CIL (Hindi) SSS & CS, Emeritus

    For me, the meaning of being ‘jungli’ or ‘wild’ is as follows - to be associated with nature; to pace along treating oneself as a part of it; one who could smile in the company of the flowers. One who could hear the call that comes from the innermost chamber of the ocean deep heart and could spread like the golden rays of the sun. One hand touching the sky when the other touching the earth! Germinate and grow even out of a handful of dust found on the top of a rocky hill! Bloom for an instant and die! A wild flower flourishes and smells wonderfully well even in the absence of moonshine and the light of the sun. It blooms in places unfathomable by human eye and beyond our imagination. This is a continuous flow like a river. The courage to stroll and march ahead the newest possible ways and the courage to face fearlessly is the nature of the wild. The forest is never partial. Life is non-aligned there. The flowers that flourish here have their own will and wish. They have neither attachment nor detachment; neither selection nor rejection. Jungle is the name of liberty from all types of bondage and burden. That liberty emanates from ultimate discipline. Though the forest is for all, yet it is not the property of any one. That is why it is jungle, the forest. Tani was the flower of the forest. That is why he was called father. That is why he could experience love. Let me say this way – he declared love. No impediment, no imperative, no fright could stop him. He sprouted again and again in any circumstances. Sprout into flower was his ultimate intent. There was life in his bloom.

    ...An excerpt from the novel

     
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    Author(s) — Adya Prasad Mishra ‘Peepra’ लेखक — आद्या प्रसाद मिश्र ‘पीपरा’

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 120 Pages | HARD BOUND | 2021 | | 5.5 x 8.5 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-81-2 |

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    Chief Editor(s) — N. Mohnan प्रधान सम्पादक — एन. मोहनन

    Editor(s) — Saji R. Kurup सम्पादक — सजी आर. कुरुप

    Co-Editor(s) — Shyam Kumar S. सह सम्पादक — श्याम कुमार एस.

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI | 816 Pages | HARD BOUND | 2021 | | 6 x 9 Inches | 850 grams | ISBN : 978-93-89341-70-6 |

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    Author(s) — Upanshu लेखक — उपांशु

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 139 Pages | PAPER BOUND | 2021 | | 5.5 x 8.5 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-73-7 |

  • Author(s) — Anchit लेखक — अंचित

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 80 Pages | PAPER BOUND | 2021 | | 5.5 x 8.5 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-75-1 |

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    Author(s) — Prabhat Praneet लेखक — प्रभात प्रणीत

    | ANUUGYA BOOKS | HINDI| 142 Pages | PAPER BOUND | 2021 | | 5.5 x 8.5 Inches | 300 grams | ISBN : 978-93-89341-83-6 |

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